स्कूल चले हम: अटल बिहारी वाजपेयी का सपना, साक्षर भारत की ओर बढ़ता भारत"हर बच्चे के हाथ में किताब, हर चेहरे पर शिक्षा की मुस्कान यही है विकसित भारत की असली पहचान।
विशेष रिपोर्ट
सिरोंचा 14 जुलाई 2026
संपादक अमित कुमार तिपट्टी
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का मानना था कि यदि देश को गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ेपन से बाहर निकालना है तो इसकी शुरुआत विद्यालय से होगी। इसी सोच को साकार रूप देने के लिए 'सर्व शिक्षा अभियान (SSA)' की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य केवल बच्चों को स्कूल तक लाना नहीं था, बल्कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना भी था।आज देश के कोने-कोने में सुनाई देने वाला नारा "स्कूल चले हम" केवल एक अभियान नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की उम्मीद और लाखों बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक बन चुका है।
सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत कब हुई? सर्व शिक्षा अभियान की औपचारिक शुरुआत वर्ष 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में की गई। हालांकि इसकी वैचारिक नींव 86वें संविधान संशोधन और शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की दिशा में रखी गई, जिसे आगे चलकर शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 ने और अधिक मजबूत किया।
सर्व शिक्षा अभियान का मुख्य उद्देश्य
इस अभियान का लक्ष्य था कि 6 से 14 वर्ष तक का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।
इसके प्रमुख उद्देश्य
हर बच्चे का स्कूल में नामांकन। प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर तक निःशुल्क शिक्षा।
बालिका शिक्षा को बढ़ावा।
अनुसूचित जाति, जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोड़ना।दिव्यांग बच्चों को भी समान शिक्षा का अवसर देना।
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार
स्कूल चले हम' अभियान की विशेषताएं
सरकार ने केवल स्कूल खोलने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बच्चों को विद्यालय तक लाने के लिए अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराईं।
नए विद्यालयों का निर्माण। अतिरिक्त कक्षाओं और शौचालयों का निर्माण। मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) योजना। निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें। छात्रवृत्ति एवं यूनिफॉर्म। प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति।
बालिकाओं के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाएं।
कितना सफल रहा यह अभियान?
पिछले दो दशकों में इस अभियान से भारत की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला। प्राथमिक स्तर पर नामांकन दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में कमी आई। बालिका शिक्षा को नई गति मिली। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में भी विद्यालयों का विस्तार हुआ। लाखों बच्चों को पहली बार शिक्षा का अवसर मिला। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है।
क्या चुनौतियां अब भी बाकी हैं?
आज भी कई दूरदराज़ और आदिवासी क्षेत्रों में—शिक्षकों की कमी, विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, डिजिटल शिक्षा तक सीमित पहुंच,आर्थिक कारणों से बच्चों का पढ़ाई छोड़ना,सीखने की गुणवत्ता में असमानता जैसी समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
नई शिक्षा नीति और आगे की राह
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने शिक्षा को और आधुनिक बनाने की दिशा तय की है। अब केवल साक्षरता नहीं, बल्कि कौशल, तकनीक, नवाचार और व्यक्तित्व विकास पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
"स्कूल चले हम" केवल एक सरकारी नारा नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत का सपना है जहां हर बच्चा शिक्षित हो, हर परिवार जागरूक हो और हर गांव ज्ञान के प्रकाश से रोशन हो।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस साक्षर भारत का सपना देखा था, वह आज लाखों बच्चों की मुस्कान में दिखाई देता है। फिर भी पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य अभी बाकी है। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं पहुंचती, तब तक यह अभियान अधूरा माना जाएगा।
शिक्षा ही वह शक्ति है जो किसी व्यक्ति का ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का भविष्य बदल सकती है। यही "स्कूल चले हम" अभियान का सबसे बड़ा संदेश है।


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