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ग्राउंड रिपोर्टर महाराष्ट्र न्यूज़

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शिक्षा वेवस्था और हम

 

क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सचमुच मजबूत बना रहे हैं?

सिरोंचा 20 जून

अमितकुमार तिपट्टी

                   आज शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा मज़ाक यह है कि सत्तर हजार से एक लाख रुपये वेतन पाने वाले सरकारी शिक्षक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने में गर्व महसूस करते हैं, जबकि दस हजार रुपये महीने की नौकरी करने वाला निजी शिक्षक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजता है।

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन शिक्षकों ने डी.एड., बी.एड., एम.एड. और पीएच.डी. जैसी उच्च शिक्षाएं हासिल की हैं, जिनकी नियुक्ति कठिन परीक्षाओं और वर्षों के प्रशिक्षण के बाद हुई है, वे स्वयं अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने पर भरोसा क्यों नहीं करते?

विडंबना देखिए...

एक तरफ प्रशिक्षित, अनुभवी और उच्च शिक्षित शिक्षक हैं, तो दूसरी तरफ अनेक निजी विद्यालयों में ऐसे शिक्षक भी मिल जाते हैं जो केवल बारहवीं पास हैं और जिन्होंने डी.एड. या बी.एड. जैसा शिक्षक प्रशिक्षण भी नहीं लिया है। फिर भी समाज का विश्वास उन्हीं स्कूलों पर दिखाई देता है।

आखिर यह कैसी व्यवस्था है?

जिस शिक्षक को तैयार करने में वर्षों की पढ़ाई, प्रशिक्षण और सरकारी संसाधन खर्च होते हैं, उस पर विश्वास नहीं। लेकिन बिना प्रशिक्षण वाले शिक्षक के हाथों में अपने बच्चों का भविष्य सौंपने में कोई संकोच नहीं।

सवाल सरकारी और निजी स्कूलों का नहीं है।

सवाल उस मानसिकता का है जिसने चमकदार इमारतों, अंग्रेजी नामों और ऊंची फीस को शिक्षा की गुणवत्ता का प्रमाणपत्र मान लिया है।

विडंबना यहीं समाप्त नहीं होती।

जो लोग संस्कृति बचाने, भारतीय मूल्यों की रक्षा करने और धर्मांतरण रोकने के नारे लगाते हैं, वही लोग बड़े गर्व से अपने बच्चों का प्रवेश मिशनरी और अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में करवाते हैं। समाज को भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाले लोग अपने बच्चों के भविष्य के लिए विदेशी शिक्षा मॉडल को बेहतर मानते हैं।

यह विरोधाभास आखिर कब तक छिपाया जाएगा?

लेकिन शिक्षा का संकट केवल स्कूलों तक सीमित नहीं है।

आज का सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सचमुच मजबूत बना रहे हैं, या अनजाने में उसे कमजोर बना रहे हैं?

आज अधिकांश बच्चे घर से अकेले स्कूल नहीं जाते। वे स्कूल बस से जाते हैं और स्कूल बस से ही वापस आते हैं। स्कूल छूटने के बाद माता-पिता स्वयं उन्हें लेने पहुंच जाते हैं। बच्चे का जीवन इतना नियंत्रित और सुरक्षित बना दिया गया है कि उसे अकेले चलना, रास्ता समझना, परिस्थितियों का सामना करना और निर्णय लेना सीखने का अवसर ही नहीं मिलता।

एक समय था जब बच्चे पैदल या साइकिल से स्कूल जाते थे। रास्ते में दोस्तों की टोली मिलती थी। कभी धूप, कभी बारिश, कभी मुश्किल रास्ते, कभी छोटी-मोटी परेशानियां — यही सब जीवन की पहली पाठशाला हुआ करती थीं।

उन्हीं रास्तों पर बच्चे व्यवहार सीखते थे।

उन्हीं रास्तों पर आत्मविश्वास पैदा होता था।

उन्हीं रास्तों पर संघर्ष करने की ताकत बनती थी।

लेकिन आज का बच्चा स्कूल बस की खिड़की से दुनिया देखता है, उसका हिस्सा बनकर नहीं।

दूसरी ओर, आज भी कुछ सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे ऐसे हैं जो घर से अकेले निकलते हैं, दोस्तों के साथ स्कूल पहुंचते हैं, रास्ते की चुनौतियों का सामना करते हैं और अपने अनुभवों से सीखते हैं। उनके लिए सड़क केवल रास्ता नहीं, बल्कि जीवन को समझने की एक खुली किताब होती है।

आज की पीढ़ी कमजोर नहीं है।उसे कमजोर बनाया जा रहा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिस पीढ़ी ने संघर्ष करके जीवन बनाया, वही पीढ़ी आज अपने बच्चों को संघर्ष से दूर रख रही है।

एक समय था जब माता-पिता बच्चों को मैदान में खेलने के लिए प्रोत्साहित करते थे। मोहल्लों के मैदान बच्चों की आवाजों से गूंजते थे। वहीं दोस्ती बनती थी, नेतृत्व पैदा होता था, हार और जीत का अर्थ समझ आता था।

आज मैदान खाली हैं और मोबाइल की स्क्रीन भरी हुई है।

बच्चे मिट्टी में खेलने के बजाय मोबाइल गेम में व्यस्त हैं।दौड़ने की जगह अंगूठे चल रहे हैं। दोस्तों की टोली की जगह ऑनलाइन चैट ने ले ली है। और सबसे दुखद बात यह है कि कई बार इस बदलाव के लिए बच्चे नहीं, बल्कि हम बड़े जिम्मेदार हैं। हम ही बच्चों के हाथों में मोबाइल देकर उन्हें घर की चारदीवारी में सीमित कर देते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि आज की पीढ़ी कमजोर हो रही है।

सच्चाई यह है कि आज की पीढ़ी में कोई कमी नहीं है।कमी हमारी सोच और परवरिश की दिशा में हैयदि हम सचमुच मजबूत, आत्मनिर्भर और संस्कारी पीढ़ी बनाना चाहते हैं, तो बच्चों को केवल किताबों की शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन की शिक्षा भी देनी होगी।उन्हें केवल अच्छे स्कूल नहीं, अच्छे अनुभव भी देने होंगे।

उन्हें केवल अंक नहीं, आत्मविश्वास भी देना होगा।क्योंकि भविष्य केवल कक्षाओं में नहीं बनता...भविष्य गलियों में बनता है, मैदानों में बनता है, संघर्षों में बनता है, और उन अनुभवों में बनता है जो किसी किताब में नहीं लिखे होते।

आज जरूरत नई पीढ़ी को बदलने की नहीं है...जरूरत अपनी सोच बदलने की है।

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