संपादकीय
सिरोंचा 18 मई 2026
अमितकुमार
सत्ता किसी की सगी नहीं होती
आज तेरे पास है, कल किसी और के पास होगी
इसलिए अभिमान नहीं, विनम्रता रखो -यही इंसान की असली पहचान है।
कर्म का अटल नियम
आपने तिनका-तिनका जोड़कर एक महल खड़ा किया, अपने सपनों, मेहनत और विशाास से उसे सजाया... और किसी ने एक झटके में उसे डहा दिया। पर याद रखिए-यह अंत नहीं है।
यह प्रकृति का नियम है। जिसने तोड़ा है, उसके साथ भी एक दिन यही खेल खेला जाएगा।
क्योंकि इस सूष्टि में हर कर्म का हिसाब तय है।
आप जो भी देते हैं- चाहे वह सम्मान हो या अपमान, सूजन हो या विनाश-वह सब एक दिन लौटकर आपके पास आता है, और वह भी "सूत समेत", यानी पहले से कई गुना होकर।
इसलिए अपने कर्मों को संभालिए,
क्योंकि समय सब देखता है, और प्रकृति कभी अन्याय नहीं करती। आज जो बोया जाता है, कल वही काटना पड़ता है।
सत्ताः एक क्षणिक मोह, स्थायी सत्य नहीं
सत्ता कभी भी शाश्वत नहीं होती। यह समय का एक ऐसा प्रवाह है, जो आज किसी के हाथों में होता है तो कल किसी और के पास चला जाता है। जो लोग इसे अपना स्थायी अधिकार समझ बैठते हैं, वे अक्सर सबसे बड़ी भूल करते हैं। क्योंकि सत्ता का स्वभाव ही परिवर्तनशील है-यह किसी की सगी नहीं होती।
आज जो नगरसेवक, नेता या पदाधिकारी हैं, वे भी इसी अस्थायी व्यवस्था का हिस्सा हैं। कई बार यह देखा गया है कि लोग सिद्धांतों से नहीं, बल्कि पैसों से प्रभावित होकर निर्णय लेते हैं। आज कोई उन्हें खरीद लेता है, तो कल कोई और। ऐसे माहौल में रिश्ते, वफादारी और नैतिकता सब कमजोर पड़ जाते हैं। सच तो यह है कि सत्ता के खेल में "कोई किसी का नहीं होता।"
यही कारण है कि घमंड करना सबसे बड़ी मुर्खता है। पद और शक्ति का अहंकार इंसान को अंधा कर देता है। वह यह भूल जाता है कि जिस ऊँचाई पर वह खड़ा है, वहाँ तक उसे उसके कमीं ने पहुंचाया है, और वही कर्म उसे नीचे भी ला सकते हैं।
यदि इंसान अपने कर्म अच्छे रखे, सच्चाई और ईमानदारी का साथ न छोड़े, तो दुनिया की कोई ताकत उसे गिरा नहीं सकती। क्योंकि अंततः जीत उसी की होती है, जो अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है।
लेकिन जब सत्ता सिर पर चढ़ जाती है, तो वही शक्ति विनाश का कारण बनती है। तब इंसान खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है, दूसरों को तुच्छ मानने लगता है। और यहीं से उसके पतन की शुरुआत होती है। ऐसा लगता है मानो पूरी कायनात उसके विरोध में खड़ी हो गई हो।
इसलिए जरूरी है कि सत्ता को साधन समझा जाए, लक्ष्य नहीं। विनम्रता, संयम और अच्छे कर्म ही वो आधार हैं, जो इंसान को स्थायी सम्मान दिलाते हैं। सत्ता आती-जाती रहेगी, लेकिन आपके कर्म ही आपकी असली पहचान बनेंगे।


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