कालेश्ववर 18 मई 2026
संवाददाता 👉 अमितकुमार
21 मई से 1 जून तक सरस्वती पुष्कर का पावन पर्व
सरस्वती पुष्कर का अंत्य पुष्कर 21 मई से 1 जून तक
श्रद्धालुओं में उत्साह, स्नान-दान और पूजा का विशेष महत्व
भारतीय सनातन परंपरा में नदियों को केवल जलधारा नहीं बल्कि जीवन और आस्था का आधार माना गया है। इसी परंपरा के अंतर्गत अत्यंत पुण्यदायी माने जाने वाले सरस्वती पुष्कर का “अंत्य पुष्कर” इस वर्ष 21 मई से 1 जून तक मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर देशभर के श्रद्धालु स्नान, दान, जप, तप और पूजा-अर्चना कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुष्कर काल में नदी स्नान करने से अनेक जन्मों के पापों का क्षय होता है तथा मन, वचन और कर्म की शुद्धि प्राप्त होती है।
क्या होता है सरस्वती पुष्कर?
ज्योतिष एवं वैदिक परंपरा के अनुसार जब देवगुरु बृहस्पति एक विशेष राशि में प्रवेश करते हैं तब संबंधित पवित्र नदी का पुष्कर पर्व आरंभ होता है। सरस्वती नदी ज्ञान, विद्या और आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक मानी जाती है। इसी कारण सरस्वती पुष्कर का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत विशेष माना जाता है।
मान्यता है कि इस अवधि में नदी के जल में दिव्य ऊर्जा का संचार होता है और श्रद्धा भाव से स्नान एवं पूजा करने वाले भक्तों को पुण्य फल प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक महत्व
धर्माचार्यों के अनुसार सरस्वती पुष्कर आत्मशुद्धि, संयम और सकारात्मक ऊर्जा का पर्व है। इस दौरान लोग प्रातःकाल स्नान कर ध्यान, मंत्र जाप, गीता पाठ एवं दान-पुण्य करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस काल में किया गया दान और सेवा कई गुना फलदायी होता है। विशेष रूप से अन्नदान, वस्त्रदान और गौसेवा को अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है।
गंगा स्नान का महत्व
सनातन धर्म में गंगा स्नान को मोक्षदायिनी माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पवित्र नदियों में स्नान करने से शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि होती है। पुष्कर काल में किया गया स्नान व्यक्ति को मानसिक शांति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।
श्रद्धालु इस दौरान “हर हर गंगे” और वैदिक मंत्रों के साथ पूजा-अर्चना कर भगवान से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
दान का विशेष महत्व
पुष्कर पर्व में दान का विशेष महत्व बताया गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार इस समय गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। तिल, अन्न, वस्त्र, फल एवं जलदान को अत्यंत शुभ माना गया है।
संत-महात्माओं का कहना है कि दान केवल वस्तु का नहीं बल्कि सेवा, करुणा और सद्भाव का प्रतीक है।
मंदिरों और घाटों पर बढ़ी तैयारियां
पुष्कर पर्व को लेकर विभिन्न मंदिरों और नदी घाटों पर तैयारियां शुरू हो गई हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पूजा, आरती और भजन-कीर्तन के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। प्रशासन द्वारा भी सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर विशेष व्यवस्था की जा रही है।
धार्मिक जानकारों का कहना है कि श्रद्धालु इस पावन अवसर पर श्रद्धा, संयम और स्वच्छता का पालन करते हुए पुण्य लाभ प्राप्त करें।
गंगा, यमुना, सरस्वती तीन नदियों का संगम है मगर कालेश्वर क्षेत्र में पांच नदियों जल से पवित्र होता है ये संगम -
ब्रह्मा की सूष्टि प्रणिता (प्राणहिता)
वरदा (वर्धा)
आदिवराह के मुंह से निकली हुई लोक पावनी गौतमी (गोदावरी)
शिव की कृपा से प्रकट हुई वैनगंगा
पाँचवी सरस्वती अंतर वाहिनी बहती है
वैनगंगा नदी मध्य प्रदेश से निकलकर दक्षिण की ओर बहती है और महाराष्ट्र के चपाराल (गढ़चिरोली) में वर्धा नदी से मिलकर 'प्राणहिता' बनाती है। और तेलंगाना से आने वाली गोदावरी समाविष्ट हो जाती है। इस तरह पांच नदियों के पवित्र जल से पवित्र होता है ये संगम !


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