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ग्राउंड रिपोर्टर महाराष्ट्र न्यूज़

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आदिवासी विकास के दावों की खुली पोल: बेझूरपल्ली में पेयजल का भीषण संकट, लाखों की पानी टंकी बनी शोपीस

आदिवासी विकास के दावों की खुली पोल: बेझूरपल्ली में पेयजल का भीषण संकट, लाखों की पानी टंकी बनी शोपीस

सिरोंचा (प्रतिनिधि): 06 जुलाई 2026

    सरकार एक ओर आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर सिरोंचा तहसील के आदिवासी बहुल बेझूरपल्ली गांव की स्थिति इन दावों की हकीकत बयां कर रही है। गांव के लोग आज भी स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं और दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।

करीब डेढ़ वर्ष पहले ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाखों रुपये की लागत से पानी की टंकी का निर्माण कराया गया था, लेकिन आज तक यह योजना शुरू नहीं हो सकी। करोड़ों की विकास योजनाओं के बीच लाखों रुपये से बनी यह पानी की टंकी केवल एक शोपीस बनकर रह गई है।

गांव के अधिकांश परिवार आज भी हैंडपंप और नाले के दूषित पानी पर निर्भर हैं। बरसात के दौरान यही पानी और अधिक प्रदूषित हो जाता है, जिससे डायरिया, बुखार, पेट संबंधी बीमारियों सहित कई जलजनित रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार कागजों में विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात आज भी बदहाल हैं।

पेयजल संकट के साथ-साथ अनियमित बिजली आपूर्ति ने भी ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आदिवासी क्षेत्रों के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि ग्रामीणों को स्वच्छ पानी, नियमित बिजली और अन्य मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं, तो यह विकास योजनाओं की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि बंद पड़ी पेयजल योजना को तत्काल चालू किया जाए, नियमित बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाए तथा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

ग्रामीणों का सीधा सवाल है— यदि लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई पानी की टंकी आज तक लोगों के किसी काम नहीं आई, तो आखिर सरकारी धन का लाभ किसे मिला? क्या आदिवासी विकास केवल सरकारी फाइलों और कागजों तक ही सीमित रह गया है?

यह सवाल अब केवल बेझूरपल्ली गांव का नहीं, बल्कि आदिवासी विकास योजनाओं की वास्तविक स्थिति पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

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